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मसालों की खेती

जानें मसालों से संबंधित योजनाओं के बारे में जिनसे मिलता है पैसा और प्रशिक्षण

जानें मसालों से संबंधित योजनाओं के बारे में जिनसे मिलता है पैसा और प्रशिक्षण

भारत की 45.28 लाख हेक्टेयर भूमि पर लाखों टन मसाले उत्पादित किये जा रहे हैं। मसाले के क्षेत्रफल में वृद्धि एवं कृषकों की आमंदनी को दोगुना करने हेतु बहुत सारी मसालों से संबंधित योजनाएं लागू की जा रही हैं। 

भारतीय व्यंजनों के स्वाद में चार चाँद लगाने वाले मसालों की विदेश में बहुत मांग हो रही है। वर्ष दर वर्ष मसालों के निर्यात में भी वृद्धि हो रही है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भी भारतीय मसालों की मांग में बहुत बढ़ोत्तरी सामने आ रही है। 

बतादें, कि केंद्र एवं राज्य सरकारों की बहुत सारी योजनाएं बेहद सहायक हो रही हैं। ऐैसी योजनाओं का ही प्रभाव है, कि वर्तमान में विभिन्न मृदा एवं जलवायु में कुल 63 प्रकार के मसाले उत्पादित किये जा रहे हैं, जिनमें से 21 मसालों की व्यावसायिक कृषि की जा रही है। 

ऐैसे मसालों में इलायची (छोटी और बड़ी), धनिया, जीरा, सौंफ, मेथी, अजवाइन, सोआ बीज, जायफल, लौंग, दालचीनी, इमली, केसर, वेनिला, करी पत्ता, काली मिर्च से लेकर लाल मिर्च, पुदीना, हल्दी, लहसुन और अदरक हैं।

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फिलहाल लहसुन उत्पादन के रूप में भारत सबसे अग्रणीय तो है, ही साथ में मिर्च की पैदावार में दूसरे एवं अदरक के उत्पादन में तीसरे तथा हल्दी की पैदावार करने में चौथे स्थान पर है। भारतीय कृषि भूमि के बहुत बड़े रकबे में जीरे की खेती हो रही है।

मसालों की खेती के लिए कृषि योजनाएं

किसान आगामी समय में मसालों की कृषि करने के बारे में सोच रहे हैं, तो सरकार की ओर से प्रशिक्षण, अनुदान व उसकी बेहतरीन सुविधा दी जाती है। 

सरकार द्वारा इनमें से कुछ योजनाएं पूरे देश में जारी हैं, तो कुछ योजनाएं राज्य स्तर पर चलाई जाती हैं। इनके अंतर्गत एकीकृत बागवानी विकास मिशन (MIDH), राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY), परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) एवं प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) भी आते हैं। 

इसके अतिरिक्त मध्य प्रदेश की राज्य सरकार भी मसाला क्षेत्र विस्तार योजना चला रही है।

राष्ट्रीय बागवानी मिशन

पारंपरिक फसलों में दिनोंदिन हो रही हानि को देखते हुए किसानों को बागवानी फसलों के उत्पादन करने हेतु प्रोत्साहित किया जा रहा है। 

मसाला भी उनमें से एक विशेष बागवानी फसल है, जिसकी कृषि से लेकर कटाई, छंटाई करने ग्रेडिंग, शॉर्टिंग, भंडारण एवं प्रोसेसिंग हेतु भी सरकार कृषकों को आर्थिक रूप से सहायता प्रदान करती है। 

राष्ट्रीय बागवानी मिशन के चलते मसालों की जैविक खेती करने वाले कृषकों को 50% अनुदान के साथ-साथ तकनीकी प्रशिक्षण का भी प्रावधान है। सरकार द्वारा मसाला भंडारण हेतु कोल्ड स्टोरेज निर्माण के लिए 4 करोड़ तक का अनुदान प्रदान करती है।

मसालों का प्रोसेसिंग यूनिट बनाने हेतु सरकार 40% फीसद मतलब 10 लाख रुपये तक का अनुदान प्रदान करती है।

मसालों की छंटाई करने ग्रेडिंग, शॉर्टिंग के लिए भी किसानों को 35% फीसद अनुदान प्रदान किया जाता है, इसकी यूनिट स्थापित करने के लिए 50 लाख रुपये तक का व्यय आ सकता है। 

मसालों की पैकिंग यूनिट बनाने हेतु 15 लाख रुपये तक व्यय हो जाता है, जिसमें 40% फीसद तक अनुदान मिल सकता है।

मसालों की खेती के लिए सब्सिडी

राष्ट्रीय बागवानी मिशन के जरिये आवेदन करने पर समस्त नियमों, शर्तों एवं योग्यता की जाँच पड़ताल कर कृषकों को मसालों की खेती हेतु आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। 

विभिन्न क्षेत्रों में मसालों का उत्पादन करने हेतु 40% अनुदान मतलब 5,500 रुपये प्रति हेक्टेयर का अनुदान प्रदान किया जाता है। अधिक जानकारी हेतु ऑफिशियल पोर्टल https://midh.gov.in/ या https://hortnet.gov.in/NHMhome पर भी जा सकते हैं। 

मसालों की अच्छी खासी पैदावार पाने हेतु कृषकों को सिंचाई हेतु अनुदान दिया जाता है। किसान चाहें तो प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के जरिये फव्वारा एवं बूंद- बूंद सिंचाई हेतु अनुदान प्राप्त कर सकते हैं, इसके हेतु Pradhan Mantri Krishi Sinchayee Yojana (pmksy.gov.in) पर आवेदन कर अनुदान का लाभ प्राप्त सकते हैं। 

साथ ही, अगर मसाले की फसल में कीट-रोग संक्रमण होता है, तो प्रबंधन हेतु 30% फीसद मतलब 1200 रुपये प्रति हेक्टेयर के अनुदान का प्रावधान है।

मसाला क्षेत्र विस्तार योजना

राज्य सरकारें मसाले की खेती व उसके उत्पादन को बढ़ाने के लिए हर संभव योजनाएं चलाती हैं। मसालों के उत्पादन में वृद्धि हेतु जारी की गयी योजनाओं में से एक है, मसाला क्षेत्र विस्तार योजना। 

इस योजना के चलते मध्य प्रदेश उद्यानिकी विभाग कुछ गिने-चुने मसालों की कृषि, क्षेत्र विस्तार एवं उत्पादन बढ़ाने हेतु कृषकों की आर्थिक सहायता करता है। 

इस योजना के अंतर्गत मसालों के बीज एवं प्लास्टिक क्रेट्स खरीदने हेतु 50 से 70 फीसद तक का अनुदान देने का प्रावधान है। इसके अतिरिक्त, जड़ या कंद वाली फसल जैसे- लहसुन, हल्दी, अदरक हेतु भी 50,000 प्रति हेक्टेयर अनुदान का प्रावधान है। 

इस योजना के अंतर्गत एक किसान को अधिकतम 0.25 हेक्टेयर से 2 हेक्टेयर तक कृषि हेतु अनुदान दिया जाता है। इससे संबंधित और अधिक जानकारी हेतु https://hortnet.gov.in/NHMhome वेबसाइट पर भी जा सकते हैं।

मसाला उत्पादन कर मालामाल हो सकते हैं, राजस्थान के किसान देखें क्या है सरकार की नई स्कीम

मसाला उत्पादन कर मालामाल हो सकते हैं, राजस्थान के किसान देखें क्या है सरकार की नई स्कीम

पुराने समय से ही भारत मसालों का देश रहा है। यहां बहुत तरह के मसाले मिलते हैं। भारत के साथ साथ दूसरे देशों में भी मसालों की डिमांड बढ़ी है। मसालों की डिमांड बढ़ने से अब किसान इसका ज्यादा से ज्यादा उत्पादन कर रहे हैं। अगर मुनाफे की बात की जाए तो यह खेती आपको काफी फायदा दे सकती है। आप चाहे तो अपनी जमीन को मसालों के बागान में बदल सकते हैं। राजस्थान सरकार का उद्यानिकी विभाग की राज्य में मसालों की खेती और इसके क्षेत्र विस्तार के लिए किसानों को सब्सिडी दे रही है। इस योजना का लाभ लेकर कम से कम खर्च करके 4 हेक्टेयर खेत में मसालों का बंपर उत्पादन ले सकते हैं।

कितना मिलेगा अनुदान

रिपोर्ट की मानें तो राजस्थान सरकार मसालों का उत्पादन करने वाले किसानों को ना सिर्फ आर्थिक सहायता दे रही है। बल्कि वह उन्हें तकनीकी सहयोग भी मुहैया करवा रही है। इसमें आपको खेती के बारे में सभी तरह की जानकारी पूरी तरह से दी जाएगी। इस स्कीम के नियमानुसार, जिन किसानों ने अभी तक मसालों की खेती पर अनुदान योजना का लाभ नहीं लिया है, उन्हें प्राथमिकता से लाभ दिया जाएगा।
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आवेदन की बात की जाए तो कोई भी किसान जिसके पास ज्यादा से ज्यादा 4 हेक्टेयर और कम से कम आधा हेक्टेयर खेत है। वह इस स्कीम के तहत अनुदान ले सकता है। दी जाने वाली राशि प्रति हेक्टेयर 13,750 रुपये निर्धारित की गई है, जिस पर 40% सब्सिडी यानी 5,500 रुपये प्रति हेक्टेयर का अनुदान मिल सकता है। इतना ही नहीं, मसालों की खेती के लिए किसानों को विभाग की तरफ से पैकेज ऑफ प्रेक्टिसेज का लीफलेट भी उपलब्ध करवाया जाएगा। बीज, पोषक तत्व, कीटनाशक आदि भी अनुदानित लागत पर उपलब्ध करवाए जाएंगे। अधिक जानकारी के लिए dipr.rajasthan.gov.in पर विस्तार से पढ़ सकते हैं।

इन जिलों में मिलेगा लाभ

स्कीम के तहत राजस्थान उद्यानिकी विभाग ने 25 जिलों का चुनाव किया है। वह जिले इस प्रकार से हैं, अजमेर , अलवर , बांसवाडा , बाडमेर , भीलवाडा , बूंदी , चित्तौडगढ , डूंगरपुर , श्रीगंगानगर , जयपुर , जैसलमेर , जालौर , झालावाड , झुंझुंनू , जोधपुर , कोटा , नागौर , पाली , सिरोही , सवाई माधोपुर , टोंक , उदयपुर , बारां , करौली शामिल है। जहां के किसान मसालों की खेती पर अनुदान का लाभ ले सकते हैं।

कैसे करें आवेदन

मसालों की खेती या मसालों का नया क्षेत्र विस्तार करने के लिए अपने नजदीकी जिला उद्यानिकी विभाग में संपर्क कर सकते हैं। इस स्कीम में आवेदन करने के लिए किसान के पास खुद की खेती योग्य जमीन, खेत की जमाबंदी, जन आधार कार्ड, बिजली का बिल, बैंक पासबुक की कॉपी और राजस्थान का निवास प्रमाण पत्र होना चाहिए। इन अगर आपके पास सभी डाक्यूमेंट्स हैं तो आप अपने नजदीकी ई-मित्र केंद्र पर जा सकते हैं और चाहे तो ऑनलाइन भी इसके लिए आवेदन दे सकते हैं।
किसानों को मिलेगा लाभ, सरकार देगी अनुदान

किसानों को मिलेगा लाभ, सरकार देगी अनुदान

रजनीगंधा, गेंदा और मसालों की खेती करने वाले किसानों के लिए बड़ी खुशखबरी है. जहां राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत चुनिंदा खेती करने वाले किसानों को अनुदान दिया जा रहा है. देश में लगातार बागवानी फसलों का क्रेज बढ़ रहा है. बागवानी की ये फसलें कम लागत के साथ कम समय में किसानों की आय बढ़ाने में मददगार साबित हो रही हैं. जिसके बाद किसान भी अन्य तरह की फसलों के साथ बागवानी फसलों की खेती करने लगे हैं. ताकि अतिरिक्त इनकम की जा सके. हालांकि इस काम में सरकार भी किसानों की खूब मदद कर रही है, ताकि वो उन्हें तकनीकी आर्थिक सहयोग दे सके. इसी तर्ज पर सरकार की राष्ट्रीय कृषि विकास योजना से उत्तर प्रदेश के किसानों को जोड़ा जा रहा है. यूपी के जिले शामली में कुछ खास चुनिंदा फल, सब्जी और फूल के साथ मसालों की खेती के लिए सरकार ने अनुदान का प्रावधान किया है. जिसे लेकर ज्यादा से ज्यादा किसानों को इसका फायदा मिल सके इसलिये उद्यान विभाग को निर्देश भी दे दिए गये हैं.

यह फसलें देंगी फायदा

गन्ना और गेहूं की फसलों के अलावा दूसरी तरह की फसलों की खेती करने को लेकर किसानों को प्रेरित करने का लक्ष्य रखा गया है. जिसके अंतर्गत समय समय पर किसानों को लाभान्वित किया जाएगा. योजना के तहत लीची, रजनीगंधा, गेंदा, शिमला मिर्च, प्याज, कद्दू की खेती पर किसानों को आर्थिक मदद दी जाती है. तो वहीं कुछ फसलों की खेती के लिए अनुसूचित जाति और जनजाति के किसानों को जोड़ा है.

कौन सी फसल में कितना अनुदान?

बागवानी की फसलों का उत्पादन बढ़ाने के अलावा खेती में लगने वाली लागत को कम करने के लिए योजना के तहत अलग अलग तरह की फसलों पर अलग अलग दरों पर अनुदान दिया जाता है.

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के बारे में

  • अगर किसान आम की बागवानी करता है तो, उसे 25 हजार 500 रुपये प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 50 फीसद अनुदान दिया जाएगा. किसानों को यह पैसा तीन किस्तों में मिलेगा.
  • अगर किसान अमरुद की बागवानी करता है तो प्रति हेक्टेयर का खर्च लगभग 38 हजार 340 रुपये तय किया गया है. जो 50 फीसद सब्सिडी के हिसाब से तीन किस्तों में दी जाएगी.
  • अगर किसान लीची की बागवानी करता है तो उन्हें प्रति हेक्टेयर की लागर करीब 28 हजार रुपये में 50 फीसद छूट मिलेगी. या पैसा भी किसानों को तीन किस्तों में दिया जाएगा.
  • वहीं शिमला मिर्च और हाइब्रिड सब्जियों के साथ कद्दू की खेती करने पर किसानों को 40 फीसद की अनुदान राशि दी जाएगी.
  • रजनीगंधा की खेती करने वाले किसनों को 40 फीसद सब्सिडी के रूप में मदद मिलेगी.
दालचीनी की खेती से संबंधित विस्तृत जानकारी (How to Grow Cinnamon)

दालचीनी की खेती से संबंधित विस्तृत जानकारी (How to Grow Cinnamon)

आज हम आपको मसालों में सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली दालचीनी के बारे में बताने जा रहे हैं। दालचीनी के अंदर विघमान कई सारे औषधीय गुण लोगों के स्वास्थ्य के लिए काफी लाभकारी होते हैं। बतादें, कि कोरोना काल में दालचीनी का इस्तेमाल काफी बढ़ गया। दालचीनी की मांग विगत कई सालों से बाजार में सदैव अच्छी-खासी बनी रहती है। अब ऐसी स्थिति में किसान इसकी खेती से काफी अच्छा लाभ उठा सकते हैं। चलिए आपको दालचीनी की खेती से संबंधित कुछ अहम जानकारी देते हैं। दालचीनी दक्षिण भारत का एक प्रमुख पेड़ है। इस वृक्ष की छाल का दवाई और मसालों के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। दालचीनी एक छोटा सदाबहार पेड़ होता है, जो कि 10–15 मीटर ऊँचा होता है। दालचीनी की खेती दक्षिण भारत के तमिलनाडू एवं केरल में इसका उत्पादन किया जाता है। दालचीनी के छाल का इस्तेमाल हम मसालों के तौर पर करते हैं। इस पौधे की पत्तियों का इस्तेमाल हम तेजपत्ते के तौर पर करते हैं।

दालचीनी की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु एवं मृदा

दालचीनी एक उष्णकटिबंधीय पेड़ की श्रृंखला में आता है। यह पौधा ग्रीष्म एवं आर्द्र जलवायु को आसानी से झेलने की क्षमता रखता है। इस जलवायु की वजह से पौधे का विकास और छाल की नकल बेहतर होती है। इस वजह से इसे नारियल एवं सुपारी के बागों में उत्पादित किया जा सकता है। परंतु, आवश्यकता से अधिक छाया दालचीनी को प्रभावित कर देती है। साथ ही, पेड़ भी कीटों की बली चढ़ जाते हैं। इस फसल को मध्यम जलवायु में खुले मैदान में अलग से भी पैदा किया जा सकता है। यह भी पढ़ें: इस औषधीय पेड़ की खेती से किसान जल्द ही हो सकते हैं मालामाल, लकड़ी के साथ छाल की मिलती है कीमत

दालचीनी की खेती के लिए भूमि की तैयारी एवं रोपण

दालचीनी के रोपण हेतु जमीन को साफ करके 50 से.मी.X50 से.मी. के गड्ढे 3 मी.X 3मी. के फासले पर खोदना चाहिए। इन गड्ढों में रोपण से पूर्व कम्पोस्ट और ऊपरी मिट्टी को भर देते हैं। दालचीनी के पौधों को जून-जुलाई में रोपित करना अच्छा होता है, क्योंकि पौधे को स्थापित होने में मानसून का फायदा मिल जाता है। 10-12 माह पुराने बीज द्वारा उत्पादित पौधे, अच्छी तरह मूल युक्त कतरनें अथवा एयर लेयर का उपयोग रोपण में करना चाहिए। 3-4 बीज द्वारा उत्पादित पौधे, मूल युक्त कतरनें या एयर लेयर पति गड्ढे में रोपण करना चाहिए। कुछ मामलों में बीजों को सीधे गड्ढे में डाल कर उसे कम्पोस्ट और मृदा से भर देते हैं । शुरूआती सालों में पौधों के अच्छे स्वास्थ्य और उपयुक्त विकास के लिए आंशिक छाया प्रदान करनी चाहिए। जून, जुलाई माह में तैयार किए गए गड्ढों के मध्य में दालचीनी का पौधरोपण करना चाहिए। इस दौरान एक बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि रोपण के पश्चात बारिश का पानी बंधा में इकठ्ठा ना हो।

दालचीनी की किस्में

अगर हम दालचीनी की किस्मों की बात करें तो कोंकण कृषि विश्वविद्यालय द्वारा साल 1992 में कोंकण तेज की खोज और प्रचार-प्रसार किया है। यह किस्म छाल और पत्तियों से तेल निकालने के लिए बेहतर मानी जाती है। दालचीनी में 6.93 प्रतिशत यूजेनॉल, 3.2 प्रतिशत तेल और 70.23 प्रतिशत सिनामोल्डेहाइड मौजूद होता है। यह भी पढ़ें: चंदन के समान मूल्यवान इन पेड़ों की लकड़ियां बेचकर होश उड़ाने वाला मुनाफा हो सकता है

दालचीनी के पेड़ के लिए उर्वरक

दालचीनी के पेड़ में प्रथम वर्ष 5 किलो खाद या कम्पोस्ट, 20 ग्राम नाइट्रेट (40 ग्राम यूरिया), 18 ग्राम फास्फोरस (115 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट), 25 ग्राम पोटाश (45 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश) ड़ाली जाए। इस उर्वरक की मात्रा प्रति वर्ष इसी प्रकार बढ़ानी चाहिए एवं 10 वर्ष के पश्चात 20 किलो खाद अथवा कम्पोस्ट, 200 ग्राम नाइट्रोजन (400 ग्राम यूरिया), 180 ग्राम फॉस्फोरस (सिंगल सुपर फास्फेट का 1 किलो 100 ग्राम) डालें। , 250 ग्राम पोटाश (पोटाश का 420 ग्राम म्यूरेट) देना उचित होता है।

दालचीनी के पेड़ों लगने वाले रोग एवं उनकी रोकथाम

बीजू अगंमारी

यह रोग डिपलोडिया स्पीसीस द्वारा पौधों में पौधशाला के दौरान होता है। कवक के द्वारा तने के चहुंओर हल्के भूरे रंग के धब्बे हो जाते हैं। अत: पौधा बिल्कुल नष्ट हो जाता है। इस रोग की रोकथाम करने के लिए 1% प्रतिशत बोर्डियो मिश्रण का छिड़काव किया जाता है।

भूरी अगंमारी

यह रोग पिस्टालोटिया पालमरम की वजह से होता है। इसके प्रमुख लक्षणों में छोटे सफेद रंग का धब्बा होता है, जो कुछ समय के पश्चात स्लेटी रंग का होकर भूरे रंग का किनारा बन जाता है। इस रोग पर सहजता से काबू करने के लिए 1% प्रतिशत बोर्डियो मिश्रण का छिड़काव करना चाहिए। यह भी पढ़ें: वरुण नामक ड्रोन 6 मिनट के अंदर एक एकड़ भूमि पर छिड़काव कर सकता है

कीट दालचीनी तितली

दालचीनी तितली (चाइलेसा कलाईटिया) नवीन पौधों एवं पौधशाला का प्रमुख कीट माना जाता है। आमतौर पर यह मानसून काल के पश्चात नजर आता है। इस का लार्वा कोमल और नई विकसित पत्तियों को खाता है। अत्यधिक ग्रसित मामलों में पूरा पौधा पत्ती विहीन हो जाता है और केवल पत्तियों के मध्य की उभरी हुई धारी ही बचती है। इसकी वयस्क बड़े आकर की तितली होती है एवं यह दो तरह की होती है। पहले बाहरी सतह पर सफेद धब्बे नुमा काले भूरे रंग के पंखों और दूसरी के नील सफेद निशान के काले रंग के पंख उपस्थित होते हैं। पूरी तरह से विकसित लार्वा तकरीबन 2.5 से.मी. लम्बे पार्श्व में काली धारी समेत हल्के पीले रंग का होता है। इस कीट को काबू में करने के लिए कोमल और नई विकसित पत्तियों पर 0.05% क्वानलफोस का छिड़काव करना फायदेमंद होता है।

लीफ माइनर

लीफ माइनर (कोनोपोमोरफा सिविका) मानसून काल के दौरान पौधशाला में पौधों को काफी ज्यादा नुकसान पहुँचाने वाला प्रमुख कीट माना जाता है। इसका वयस्क चमकीला स्लेटी रंग का छोटा सा पतंगा होता है। इसका लार्वा प्रावस्था में हल्के स्लेटी रंग का उसके उपरांत गुलाबी रंग का 10 मि.मीटर लम्बा होता है। यह कोमल पत्तियों की ऊपरी और निचली बाह्य आवरण (इपिडरमिस) के उतकों को खाकर उस पर छाले जैसा निशान छोड़ देते हैं। ग्रसित पत्ती मुरझाकर सिकुड़ जाती हैं एवं पट्टी पर बड़ा सा छेद भी बन जाता है। इस कीट पर नियंत्रण पाने हेतु नवीन पत्तों के निकलने पर 0.05% क्वनालफोस का छिड़काव करना काफी अच्छा होता है। सुंडी और बीटल भी दालचीनी के नए पत्तों को प्रभावी तौर पर खाते हैं। क्वनालफोस 0.05% को डालने से इसको भी काबू में कर सकते हैं।

पर्ण चित्ती एवं डाई बैंक

पर्ण चित्ती और डाई बैक रोग कोलीटोत्राकम ग्लोयोस्पोरियिड्स की वजह से होता है। पत्तियों की पटल पर छोटे गहरे सफेद रंग के धब्बे आ जाते हैं, जो नाद में एक दूसरे से मिलके अनियमित धब्बा तैयार करते हैं। कई बार देखा गया है, कि पत्तों के संक्रमित हिस्से पर छेड़ जैसा निशान नजर आता है। इसके पश्चात संपूर्ण पत्ती भाग संक्रमित हो जाता है। इतना ही नहीं यह संक्रमण तने तक फैलकर डाई बैक की वजह बनता है। इस रोग की रोकथाम करने के लिए संक्रमित शाखाओंं की कटाई-छटाई एवं 1% बोर्डियो मिश्रण का छिड़काव किया जाता है।
राजस्थान सरकार किसानों को फल और मसालों की खेती के लिए प्रोत्साहन राशि दे रही है।

राजस्थान सरकार किसानों को फल और मसालों की खेती के लिए प्रोत्साहन राशि दे रही है।

राजस्थान सरकार राष्ट्रीय बागवानी मिशन और कृषि विकास योजना के अंतर्गत किसानों को अनुदान प्रदान करेगी। दरअसल, राज्य में किसानों को पारंपरिक फसलें जैसे कि मक्का, गेहूं और सरसों आदि की खेती से अच्छी आमदनी नहीं हो पा रही है। राजस्थान में किसान अब बागवानी और मसालों की खेती करेंगे। इसके लिए किसानों को राज्य सरकार की तरफ से अच्छी खासी सब्सिडी मुहैय्या कराई जाएगी। मुख्य बात यह है, कि सब्सिडी पाने के लिए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की सरकार द्वारा करोड़ों रुपये की धनराशि स्वीकृत कर दी है। अगर राजस्थान के किसान फल और मसालों की खेती करते हैं, तो उन्हें 40 प्रतिशत तक अनुदान मिलेगा। इसके लिए उन्हें राजकिसान साथी पोर्टल पर जाकर आवेदन करना पड़ेगा।

राजस्थान के किसानों को पारंपरिक फसलों से कोई लाभ नहीं मिला

राजस्थान सरकार राष्ट्रीय बागवानी मिशन और कृषि विकास योजना के अंतर्गत किसानों को अनुदान देगी। दरअसल, राज्य सरकार का यह मानना है, कि प्रदेश में किसान भाइयों को गेहूं, सरसों एवं मक्का जैसी पारंपरिक फसलों की खेती से अच्छी आय नहीं हो पा रही है। अगर प्रदेश के किसान आधुनिक विधि से बागवानी और मसालों की खेती करते हैं, तो किसानों की आमदनी में काफी बढ़ोतरी हो सकती है। यही कारण है, कि राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बागवानी और मसाले के क्षेत्रफल में विस्तार करने के लिए 23.79 करोड़ रुपये की मंजूरी दी है। ये भी पढ़े: दालचीनी की खेती से संबंधित विस्तृत जानकारी (How to Grow Cinnamon)

राजस्थान सरकार 7609 हेक्टेयर में फल के बगीचे तैयार कर रही है

सरकारी अधिकारियों के अनुसार, राजस्थान सरकार ने वर्ष 2023-24 में 7609 हेक्टेयर भूमि में फल के बगीचे तैयार करने की योजना तैयार की है। इसके ऊपर सरकार सब्सिडी के तौर पर 22.40 करोड़ रुपये खर्च करेगी। साथ ही, मसाले के रकबे के विस्तार पर अनुदान धनराशि के रूप में 1.39 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। मुख्यमंत्री कार्यालय के अनुसार, सीएम गहलोत द्वारा मंजूर किए गए 23.79 करोड़ रुपये में से 17.24 करोड़ रुपये की धनराशि राजस्थान कृषक कल्याण कोष में से प्रदान की जाएगी। साथ ही, 6.55 करोड़ रुपये राष्ट्रीय बागवानी मिशन एवं राष्ट्रीय कृषि विकास योजना से खर्च किए जाएंगे।

राजस्थान सरकार कितना अनुदान प्रदान कर रही है

मुख्य बात यह है, कि राजस्थान में सरकार पूर्व से ही मसालों की खेती पर अनुदान मुहैय्या कर रही है। साथ ही, किसानों को आधुनिक विधि से मसालों की खेती करने के लिए प्रशिक्षण भी दिया जाता है। लेकिन, इस योजना के अंतर्गत ज्यादा से ज्यादा 4 हेक्टेयर एवं कम से कम 0.50 हेक्टेयर में मसालों की खेती करने वाले किसान अनुदान का फायदा उठा सकते हैं। किसानों को 40 प्रतिशत अनुदानित धनराशि दी जाएगी। मतलब कि उन्हें प्रति हेक्टेयर 5500 रुपये अनुदान के रूप में मिलेंगे।

अनुदान का फायदा लेने के लिए आवश्यक दस्तावेज

अगर किसान भाई अनुदान का फायदा उठाना चाहते हैं, तो नजदीकी ई-मित्र केंद्र अथवा राजकिसान साथी पोर्टल पर जाकर आवेदन कर सकते हैं। आवेदन करते समय किसान के पास खुद की खेत की जमाबंदी, आधार कार्ड, खेती योग्य जमीन, इलेक्ट्रिसिटी बिल, बैंक पासबुक की कॉपी और स्थानीय आवासीय प्रमाण पत्र होना काफी अनिवार्य है।
आप अपने बगीचे के अंदर इन महकते मसालों के पौधे उगाकर अपनी रसोई में उपयोग कर सकते हैं

आप अपने बगीचे के अंदर इन महकते मसालों के पौधे उगाकर अपनी रसोई में उपयोग कर सकते हैं

आपने मसालों की खेती के विषय में तो काफी सुना होगा। परंतु, आज हम आपको इन्हीं में से कुछ चुनिन्दा मसालों को अपने बगीचे में लगाने के संबंध में बताने वाले हैं। चलिए आपको आगे इस लेख में बताऐंगे कि किन मसाला पौधों का इस्तेमाल घर के बगीचे में किया जा सकता है। आज हम आपको बागवानी के कुछ ऐसे विशेष टिप्स बताने जा रहे हैं, जो आपके इस शौक को और भी ज्यादा बढ़ा देंगे। बिल्कुल, यदि आपको भी बागवानी का शौक है और आप भी कुछ विशेष पौधों को अपने बगीचे की शान बनाना चाहते हैं, तो आपको मसालों की दुनिया में भी एक कदम रखना चाहिए। जो आपके बगीचे को तो सुगंधित करेंगे। साथ ही, आपके स्वाद को भी खूब बढ़ाएंगे। चलिए जानते हैं, कि किन मसाला पौधों को हम अपने बगीचे में उगा सकते हैं।

मिर्च एवं शिमला मिर्च के पौधे

मिर्च हो अथवा शिमला मिर्च दोनों ही हमारे बगीचे में ऐसे मसाले का कार्य करते हैं, जो कम जगह में अधिक पैदावार देने में सक्षम होते हैं। इतना ही नहीं मिर्च ही एक ऐसा मसाला है, जो खाने को सबसे अधिक स्वादिष्ट बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

धनिया के पौधे

यदि आप अपने बगीचे को खुशबू से महकाना चाहते हैं, तो धनिया के पौधे इस दिशा में काफी महत्वपूर्ण होते हैं। आप इस पौधे का इस्तेमाल मसाले और पत्तियों दोनों प्रकार से कर सकते हैं। आप इसे जरा सी जगह में ज्यादा मात्रा में पैदा कर सकते हैं।

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धनिया की खेती से होने वाले फायदे

सरसों के पौधे

आम तौर पर इस पौधे का इस्तेमाल हम खाने के तेल के स्वरूप में करते हैं। परंतु, इसका इस्तेमाल मसाला के तौर पर भी किया जाता है। आज हम विभिन्न प्रकार के स्वादिष्ट पकवानों को निर्मित करने के लिए सरसों के बीजों का इस्तेमाल करते हैं। आप मसाले के उपयोग के लिए इन्हें घर में भी पैदा कर सकते हैं। आरंभिक दिनों में यह पौधे फूलों और बाद में यह मसाले के तौर पर कार्य करते हैं।

अदरक के पौधे

अदरक एक ऐसा पौधा है, जिसके अंदर काफी ज्यादा औषधीय गुण मौजूद होते हैं। हम अदरक का इस्तेमाल सब्जी के मसाले के तौर पर करने के साथ-साथ अन्य भी विभिन्न उपयोगी कामों में भी करते हैं। यदि आप पौधों को अपने घर में लगाना पसंद करते हैं, तो आपको भी इन पौधों को एक बार अवश्य होम गार्डनिंग में शम्मिलित करना चाहिए। अगर आपके समीप ज्यादा भूमि नहीं है, तो आप इन पौधों के लिए गमले अथवा घर की छत को भी बगीचे की भाँति उपयोग में ला सकते हैं।